कई बार इसका दामन भर दिया हुस्ने-दो-आलम से – फैज़ शायरी

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फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ भारतीय उपमहाद्वीप के एक विख्यात पंजाबी शायर थे. वे उर्दू शायरी के सबसे बड़े नाम में गिने जाते हैं. उनकी एक ग़ज़ल सुनिए – “कई बार इसका दामन भर दिया हुस्ने-दो-आलम से”.

कई बार इसका दामन भर दिया हुस्ने-दो-आलम से

मगर दिल है कि उसकी खाना-वीरानी नहीं जाती

कई बार इसकी खातिर ज़र्रे-ज़र्रे का जिगर चीरा

मगर ये चश्म-ए-हैरां, जिसकी हैरानी नहीं जाती

नहीं जाती मताए-लाला-ओ-गौहर की गरांयाबी

मताए-ग़ैरत-ओ-ईमां की अरज़ानी नहीं जाती

मेरी चश्म-ए-तन आसां को बसीरत मिल गयी जब से

बहुत जानी हुई सूरत भी पहचानी नहीं जाती

सरे-ख़ुसरव से नाज़-ए-कज़कुलाही छिन भी जाता है

कुलाह-ए-ख़ुसरवी से बू-ए-सुल्तानी नहीं जाती

ब-जुज़ दीवानगी वां और चारा ही कहो क्या है

जहां अक़्ल-ओ-खिरद की एक भी मानी नहीं जाती

  • Listen to this ghazal audio version from the album “Naqsh-E-Faryadi”, recital by Faiz – Play on Gaana.

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